कुरुक्षेत्र के रण में होगी ‘अर्जुन’ की कड़ी परीक्षा, अब से पहले कैलाशो सैनी जीती थीं

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कुरुक्षेत्र के रण में तब भी अर्जुन थे, आज भी अर्जुन हैं। तब लड़ाई हस्तिनापुर के सिंहासन की थी, अब लड़ाई सियासत की है। वे अर्जुन पांडव थे और यह ताऊ देवीलाल की चौथी पीढ़ी के अर्जुन हैं। महाभारत के रण में अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे, जो उन्हें विजयी बनाकर ले गए। सियासत के इस युद्ध में अर्जुन चौटाला के सारथी उनके पिता अभय चौटाला होंगे। जिनके ऊपर बेटे को चुनावी चक्रव्यूह से बाहर निकालकर विजयी बनाने का दारोमदार रहेगा। इस सियासी युद्ध में अभय चौटाला के रणनीतिक और कूटनीतिक कौशल की भी परीक्षा होगी।

अभय चौटाला पर इस बार के चुनाव में पार्टी सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला की गैर मौजूदगी में इनेलो को एक बार फिर साबित करने की चुनौती है। चूंकि, इस बार हालात पहले से भिन्न हैं। परिवार और पार्टी दोनों टूटे हैं। इनेलो के विघटन के बाद जननायक जनता पार्टी का उदय हुआ है। भतीजे दुष्यंत चाचा अभय चौटाला को सीधी टक्कर दे रहे हैं। पारिवारिक रिश्तों में इतनी खटास आ चुकी है कि राम-सलाम भी नहीं रही। भतीजे तो सलाम ठोकते हैं, लेकिन चाचा अभय अनदेखा कर देते हैं।

अब कुरुक्षेत्र के रण में अभय चौटाला बेटे अर्जुन को कैसे विजयी बनाते हैं, इस पर सबकी निगाहें रहेंगी। क्योंकि, अभय ने अपने बेटे की राजनीतिक लांचिंग सबसे कठिन समय में की है। अर्जुन इनेलो के अग्रणी संगठन आईएसओ के राष्ट्रीय प्रभारी हैं, उन्होंने नए छात्र संगठन में जान-फूंकने का काम किया है।

चुनावी राजनीति का नहीं अनुभव

अुर्जन चौटाला को चुनावी राजनीति का अनुभव बिल्कुल नहीं है। इसलिए उनके सामने पिता की विरासत को संभालने की भी सीधी चुनौती रहेगी। अभय चौटाला के परिवार से अर्जुन चौटाला पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जो कोई चुनाव लड़ने जा रहे हैं। उनकी पत्नी और दूसरा बेटा करण चुनावी राजनीति से दूर हैं।

ऐसे में अर्जुन पर पिता की विरासत को आगे ले जाने की बड़ी जिम्मेदारी भी आ गई है। कुरुक्षेत्र में जाटों की संख्या अच्छी खासी है, अन्य जातियों के मतदाता भी यहां बड़ी संख्या में हैं। ऐसे में अर्जुन के लिए पहला लोकसभा चुनाव आसान नहीं होने वाला। हालांकि, उन्हें ताऊ देवीलाल के साथ दादा ओपी चौटाला और पिता अभय चौटाला के नाम पर फायदा जरूर मिलेगा।

अस्तित्व में आने के बाद एक बार ही जीता कुरुक्षेत्र
इनेलो ने 1999 में अस्तित्व में आने के बाद पहले चुनाव में ही कुरुक्षेत्र का रण फतह किया था। इनेलो से कैलाशो सैनी सांसद बनी थीं। हालांकि इससे पहले हरियाणा लोकदल राष्ट्रीय के झंडे तले भी कैलाशो सांसद रह चुकी हैं। लोकदल राष्ट्रीय की अगुवाई भी चौटाला परिवार ही करता रहा। 2004 व 2009 में कुरुक्षेत्र से नवीन जिंदल कांग्रेस सांसद रहे। 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर में भाजपा ने कांग्रेस से यह सीट छीनी और राजकुमार सैनी सांसद बने। सैनी भाजपा से बागी होकर अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं।

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